अग्रविश्व ज्ञानपीठ

(पौरुषिक उर्जामयी विश्व)


प्रारब्ध को अलंकृत करने के लिये आवश्यक है - पुरुषार्थ।
यह संसार असार नहीं है।
हम इसे अपने प्रयत्नों से श्री अग्रसेन के अनुरूप आनन्दमय वैकुण्ठ बना सकते हैं।

सुचित्रं सुखसम्पूर्णं नित्योत्सव विभूषितम् ।

द्वितीयमिव वैकुण्ठं स्थापितं विष्णुना हि तत् ॥

श्रेष्ठ आचरण ही चारों पुरुषार्थों- अर्थ, धर्म, काम व मोक्ष का प्रदाता है।

आचरण की हीनता के कारण ही विश्व की पौरुषिक उर्जा क्षीण हुई है। सुसंस्कारित नहीं होने के कारण मानव समाज भ्रष्ट आचरण से ग्रसित होकर क्लांत, अशांत व दुखी है।

आनन्द के पथ के प्रवेशद्वार हैं - स्वस्थ शरीर, प्रसन्न मन, उर्वर मष्तिष्क।

३ से ७ वर्ष की अवस्था में प्राप्त ज्ञान, चेतना, संस्कार व आचरण, ७ से १६ वर्ष की अवस्था में परिपक्व होते हैं और वही जीवन का आधार बन जाते हैं ।

अतः अग्रविश्व ज्ञानपीठ के विज्ञानी विशेषज्ञों द्वारा स्वस्थ व सबल संस्कारित विश्व के नव निर्माण हेतु भारतीय ऋषियों-महर्षियों द्वारा प्रदत्त तथा श्रेष्ठ जनों द्वारा आचरित सुसंस्कारित ज्ञान व उन्नत विज्ञान से सम्पन्न शिक्षा पद्यति का शोध किया गया है।

जिसे अग्रविश्व ट्रस्ट की शाखाओं के माध्यम से गांव गांव तक पहुंचाने का संकल्प, निश्चित ही स्वर्णिमयुग की संस्थापना का आधार बनेगा।

अग्रविश्व ट्रस्ट के महत् उपक्रम का यह एक प्रधान अंग है।