परस्पर विरोधी संस्कृतियों के समन्वयक : श्री अग्रसेन

ऐतिहासिक सत्य है कि वैष्णव (आर्य) एवं शैव (नाग) संस्कृतियां परस्पर विरोधी रही हैं। साम्प्रदायिक दुर्भाव तथा धर्मान्धता के दुर्गुणों के कारण मानवीय इतिहास, भयंकर द्वंदों तथा रक्तपात के दुराचरण से सदा कलंकित होता रहा है। नागराज महीधर, वैष्णवों से द्वेष भाव रखते थे, वे यह सोचते थे कि वैष्णव शिवद्रोही हैं, (नाग संस्कृति के पोषक नागराज, भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के, नागों से वैर की भावना के वशीभूत) वे सदैव वैष्णवों के दोष ही ढूंढा करते थे। उनका मानना था कि –

यथा पुष्करपत्रेषु पतितास्तोयबिन्दव: ।
तथा न श्लेषमिच्छन्ति ज्ञातय: स्वेषु सौहृदम् ॥

जैसे कमल के पत्तों पर पर गिरी हुई पानी की बूंदे, उसमें अधिक देर नहीं टिकती, वैसे ही आर्यों के हृदय में, परस्पर सौहाद्र अधिक देर नही टिकता। ऐसे वैष्णवों के अनकों दोषों का बखान करते हुए उनका मत था –

हृष्यन्ति व्यसनेष्वेते ज्ञातीनां ज्ञातय: सदा ॥
नागकन्यां प्रार्थयानस्त्वं नाप्यामकृतात्मभिः ।

वहां ( वैष्णव ) सर्वदा अपने अन्य सजातीय बंधुओं के दुख में या आपत्ति में पडने पर ही हर्ष मनाते हैं । जिनका अन्तःकरण शुध्द नहीं है, अथवा जो पुण्यात्मा नहीं है, उन वैष्णवों के लिये नागकन्या की प्राप्ति असंभव है।

नागराज का ऐसा विचार उनके आर्यों के प्रति द्वेष भाव तो था ही, इसीलिए उन्होने स्वयंवरा माधवी जी का विवाह देवराज इन्द्र के साथ करने का निश्चय कर रखा था। जबकि नागलोक की परम्परा के अनुकूल कन्या स्वयं वर का चयन करती थी। नागसुता माधवी जी ने श्री अग्रसेन के परम दयाभाव को देखते ही मन ही मन उनका वरण कर लिया था। तथापि नागपाश बंधन से विमुक्त श्री अग्रसेन ने अपनी चैतन्य बुद्धि व दिव्य ज्ञान के प्रकाश से नागराज व उनकी सभा को विनम्रतापूर्वक पराभूत कर दिया। इस संदर्भ में महर्षि जैमिनी जी का कथन दृष्टव्य है -

युवा मतिमतां श्रेष्ठो ज्ञानविज्ञानकोविद: ।
सर्वानेव निजग्राह चकार निरुत्तरम् ॥

जैमिनीजी कहते हैं - श्री अग्रसेन युवा होकर भी , श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त तथा ज्ञान विज्ञान में प्रवीण थे, इसलिये अपने तर्क पूर्ण आग्रह वचनों से, उन्होंने नागलोक के उन सभी को निगृहीत करते हुए, निरुत्तर कर दिया ।

महामानव श्री अग्रसेन ने 'वैष्णव-शैव' परस्पर विरोधी संस्कृतियों में समन्वय स्थापित करने का जो अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है, वह साम्प्रदायिक सदभाव की प्रेरक शक्ति बने। दो भिन्न संस्कृतियों के इस गंगा-जमुनी मिलन के अनुपम 'श्री अग्रमाधवी' विवाहोत्सव के रोचक प्रसंग दृष्टव्य हैं-

वर्गावुभौ नागनराधिपानां व्दारेऽपिधाने ह्युभयप्रदेशात्‌।
समीयतुर्व्दावपि भिन्नवेषौ भन्नैकसेतू पयसामिवोघौ ॥

जब, वर और कन्या दोनों पक्ष वाले, वे ( दो भिन्न संस्कृतियां) नाग और नर एक द्वार पर आकर मिले, तो ऐसा लगने लगा कि जैसे - बांध के टूट जाने पर अलग - अलग नदियों की दो धाराएं आकर परस्पर मिल गई हों ।

वैवाहिके कौतुक संविधाने वर्गावुभौ नागनराधिपानाय् ।
एकीकृतौ सानुमतोऽनुरागादस्तान्तरावेक कुलोपमेयम् ॥

विवाह के इस उत्सव में, नाग और नर दोनों ही वर्ग, वहां प्रेममय, एकरस होकर इस प्रकार मिल रहे थे, कि सभी विभेद मिट गए। तब ऐसा लगने लगा कि जैसे वे एक ही कुल के हों। दो संस्कृतियों के, दो सभ्यताओं के, ऐसे मनोहारी मिलन की स्मृति को जीवंत रखने हेतु, नागराज महीधर ने अपने नागलोक के तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, और पाताल इन सात लोकों में से एक तल (राज्य) सांस्कृतिक समन्वय के पुरोधा श्री अग्रसेन के नाम से ''अग्रतल'' के रुप में घोषित कर दिया –

अग्रस्य नाम्ना भाषेरन् इमं लोकं तलोत्तमम्‌ ॥

नागराज महीधर ने कहा - '' अग्रस्य नाम्ना भाषेरन् इमं लोकं तलोत्तमम् '' इस नागलोक का यह उत्तम तल (राज्य) आज से श्री अग्रसेन के नाम से पुकारा जाएगा ।

सुसंस्कृतेभ्य: सर्वेभ्य: रमणीयो भविष्यति ।
इदमग्रतलं नाम्ना त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्‌ ॥

दोनों संस्कृतियों (शैव और वैष्णव संस्कृति) का यह सम्मलित केन्द्र अत्यंत मनोहर प्रदेश ''अग्रतल'' के नाम से (देवलोक,नागलोक,मानवलोक) तीनों लोकों में प्रसिद्ध होगा ।

सर्वरत्नाकरवती सर्वकामफलद्रुमा ।
सर्वाश्रमाधिवासा साऽग्रतलाख्य गुणैर्युता ॥

इस तल पर जो नगर बसेगा (बसाया जाएगा) वह सब प्रकार के रत्नों की खान होगा। यहां के वृक्ष सम्पूर्ण मनोवांच्छित कामनाओं को, फल के रूप में प्रदान करने वाले होंगे सभी आश्रमों के लोग यहां निवास करेंगे, और यह नगर समस्त अभिलाषित गुणों से परिपूर्ण होगा।

सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक वह श्री अग्रसेन जी का विवाह स्थल ''अग्रतल'' आज भी अगरतला के रूप में विद्यमान है और वर्तमान में त्रिपुरा की राजधानी है।

श्री अग्रसेन जी के इस सांस्कृतिक सामन्जस्य के ऐतिहासिक प्रयास ने वैष्णव एवं शैव संस्कृतियों तथा विचारधारओं को एक नए दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया जो सारे विश्व के विभिन्न दर्शनों में अद्वितीय है एवं आज के विषैले साम्प्रदायिक तथा धर्मान्ध वातावरण से ग्रसित विश्व के लिए सर्वाधिक प्रासंगिक व मार्गदर्शक भी ।

©- रामगोपाल 'बेदिल'