समता के समन्वयक : श्री अग्रसेन

कर्मयोगी लोकनायक महाराजा श्री अग्रसेन का ''समता'' का सिद्धान्त सामाजिक दायित्व का ऐसा उपकारहीन उपक्रम है, जो 'समाजवाद' से

अनन्त श्रेष्ठ मानवता का पोषक तथा सर्वलोक कल्याण का अनुपम व अनोखा व एकमात्र आदर्श उदाहरण है।

विभेद चाहे समाजिक रहा हो, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक या मानवीय, श्री अग्रसेन ने सभी विभेदों को अपने लोक-व्यवहार से दमन कर सबके प्रति समान अनुभूति अपना कर, सारे जगत को मानवता का संदेश दिया।

''समता सर्वभूतेषु'' की भावना से मंगलमय समाज की संरचना करने वाले श्री अग्रसेन ने प्राणीमात्र के सर्वोत्थान को लक्ष्य कर सामाजिक विषमता नाशक, अपने जीवन का स्वरूप निर्धारित किया। दुर्भाग्यवश किसी व्यक्ति के विपन्न हो जाने पर, उसके स्वाभिमान की सुरक्षितता के साथ उसके उत्थान की व्यवस्था करने हेतु आग्रेय गणराज्य में लागू किया गया ''समता का नियम'' सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था के इतिहास में अद्वितीय व प्रांजल्य है। इस संदर्भ में श्री अग्रसेन के वचन दृष्टव्य हैं कि –

आनृश्यंस्यं परो धर्म: याच्यते यत् प्रदीयते ॥

याचक को दिया गया दान ही, मनुष्य का दया रुपी परम धर्म है ।

कृशाय कृतविद्याय वृत्तिक्षीणाय सुव्रत ।
क्रिया नियमिता: कार्या: पुत्रैर्दारैश्च सीदते ॥
अयाचमाना: सर्वज्ञा: सर्वोपायै: प्रयत्नत: ।
ते रक्षणीया विव्दांस: सर्वकामसुखावहै: ॥

जो व्यक्ति विद्वान अथवा योग्य होने के बावजूद, भाग्यवशात् अपनी आजीविका के क्षीण हो जाने के कारण दीन ( निर्धन ) हो जाते हैं, तथा स्त्री पुत्रादिकों के पालन कर सकने में असमर्थ हो जाने के कारण, अनेकों कष्ट उठाते हैं। तथापि किसी से याचना नहीं करते ऐसे (स्वाभिमानी) पुरुषों को प्रत्येक उपाय से सहयोग देने के लिये प्रयत्न करना चाहिये। उनकी उपयुक्त आवश्यकताओं की जानकारी लेकर, उनके सुख की स्थापना हेतु, समुचित कर्म करना चाहिये।

श्री अग्रसेन ने निर्देश देते हुए स्पष्ट इंगित किया है, कि दान देने से भी श्रेष्ठ कृत्य, दूसरों की आजीविका का प्रबंध करना है, और यह कर्म उपकार की नहीं, कर्तव्य की भावना से किया जाना चाहिये। कारण –

अपरेषां परेषां च परेभ्यश्चापि ये परे ।
कस्तेषां जीवितेनार्थस्त्वां विना बन्धुराश्रय: ॥

छोटे, बड़े तथा जो बडे से भी बडे हैं, या उनसे भी आगे हैं, परस्पर बन्धुजनों के आश्रय बिना, उनके जीवन का क्या प्रयोजन है ? अर्थात् - ऐसे लोग जो छोटे-बडे, अमीर- गरीब, के विभेद से परस्पर सौजन्य से हीन हों उनका जीवन निरर्थक है।

प्रत्येक समाज में अपने अपने भाग्य के अनुकूल, व्यक्ति सम्पति, ज्ञान, बल, ऐश्वर्य आदि से कम ज्यादा होते ही हैं, कुछ निर्धन, अज्ञानी, कमजोर, होते हैं, और कुछ उनसे सशक्त, धनवान, ज्ञानी, कुछ उन सबसे आगे और कोई विशिष्ट श्रेयता को प्राप्त सबसे आगे। किन्तु परस्पर अपने दीन हीन बन्धुओं के प्रति श्रेयता प्राप्त लोगों में बन्धुत्व भाव का अभाव होने पर, सौजन्यता बिना उनका जीवन निरर्थक हो जाएगा, अतः समाज में कभी भी विभेद की परिस्थिति पैदा न होने देना चाहिए, अतः

सर्वोत्थानाय सश्रद्धं भ्रातृभावेन चावह ।
योगं क्षेमञ्च मन्वान: गृह्णीयुस्तेऽभिमानत: ॥

सर्वोत्थान की दृष्टि से, बंधुभाव से, श्रृद्धायुक्त ( ऐहसान जताते हुए नहीं, ) और पवित्र मन से (लोकेष्णा के स्वार्थ से रहित) 'योगक्षेम' की (यह मेरा कर्तव्य है इस प्रकार मानकर) कर्तव्य बुद्धि से, सामदायिक विकास की दृष्टि से, परस्पर सहयोग का निर्देश करते हुए, श्री अग्रसेन ने ''आग्रेय गणराज्य'' में ''समता का नियम'' लागू करने हेतु आव्हान कि –

देयानि वृत्तिक्षीणाय पौरैरेकैकश: क्रमात् ।
गत्वा निष्केष्टिकां दद्यु: जनः कुर्यान्नयाचनाम् ॥

इसलिये, आज से इस राष्ट्र ( आग्रेय ) में, जो भी व्यक्ति भाग्यवशात यदि आजीविका से हीन हों, उन्हे बिना याचना किए ही, राज्य के सभी निवासी ( निष्क = रुपया ) और एक एक ईंट स्वयं उनके पास जाकर भेंट स्वरुप दें।

ज्ञातव्यः - द्वापर के उस अन्तिम चरण में विनिमय की दृष्टि से ( निष्क = धातुअंश जो प्रचलन में रहा होगा वह)'स्वर्णमुद्रा' को हम आज विनिमय के आधार रुपये के रुप मे - 'रुपया' कह सकते है। इस रुपये ईटं के नियम को लागू किये जाने के मूल में महाराजा अग्रसेन की जो भावना निहित है उस पर चिन्तन की आवश्यकता है। वस्तुतः इस नियम के मूल में आवश्यकता है :-

१ - ऐसे व्यक्ति की, जो याचना नहीं करता किन्तु उसे सहयोग दिया जाना चाहिये, सामाजिक स्तर पर ऐसे व्यक्ति की, तलाश करनी चाहिये। समाज को ध्यान रखना चाहिये एक दूसरे का।
२ - सद्भावना पूर्वक ऐसे व्यक्ति की आजीविका के प्रबंध हेतु राज्य के, समाज के, सभी बंधुओ को ऐसे व्यक्ति के उत्थान का सम्मलित प्रयास करना चाहिये।
३ - भेंट स्वरुप प्रदान करने वाले में न तो उपकार का अहंकार उपजता और न ही भेंट स्वीकार करने वाले को स्वाभिमान को ठेस पहुंचती।

एष ते विततं वत्स सर्वभूतकुटुम्बकम् ।
विशिष्ट: सर्वयज्ञानां नित्यमत्र प्रवर्तताम् ॥

इस प्रकार सब प्राणियों के प्रति कुटुम्बवत समत्व स्थापना के इस पुनीत कार्य का जो विस्तार होगा, वह सभी यज्ञों से बढ़कर है, अतः तुम लोगों को, इस ''कर्मयज्ञ'' को सदैव गतिशील रखना चाहिए।

हे मानवों ! यदि तुम इस प्रकार करोगे तो वह निश्चय ही जगत में तुम्हारे लिये व जगत के लिए परम कल्याणकारी होगा।

  • निवेदन- जन-जन में समता स्थापित कर, बन्धुत्व की भावना विकसित करना, व्यक्ति के, समाज के, राष्ट्र के तथा मानवता के कल्याण का सूत्र है । 'समाजवाद' या 'साम्यवाद' जैसे सीमित शब्द से इस व्यवस्था का आकलन करना, इस समता के सर्वलोक कल्याणकारी स्वरुप की गरिमा को क्षीण करना ही है। विदुजन 'महाराजा अग्रसेन' के इस समता के सिद्धांत की अर्न्तभावना का यर्थाथ चिंतन कर, उसे प्रकाशित करने का प्रयत्न करें, हमारा यही विनम्र निवेदन है।

©- रामगोपाल 'बेदिल'