विश्व में अव्दितीय

॥ श्रीमद् अग्रभागवतम् ॥

बीजग्रन्थ

सदियों से विलुप्त महर्षि जैमिनी रचित जयभारत ग्रन्थ का यह अंश, कागज से भी पतले महीन,फूलों की पंखुरियों से हल्के, भोजपत्रों पर अदृश्य लिपि में अंकित यह अद्भुत, अलौकिक व दिव्य ग्रन्थ विश्व में अव्दितीय है।

सदियों से विलुप्त, युगदृष्टा श्री अग्रसेन की लोककल्याणकारी जीवन गाथा, एक सिद्ध महर्षि के हस्ते, अत्यन्त रहस्यमयी परिस्थितियों में ९ अगस्त १९९१ को, श्री बेदिल के नाम से विख्यात परमपूज्य आदरणीय श्री रामगोपाल जी अग्रवाल को उपलब्ध हुई।

बीजग्रन्थ फूलों की पंखुरियों से भी हल्के और महीन भोजपत्रों का है। जिस पर गाथा तात्कालीन लिपि में अमिट अक्षरों में अंकित है, और लिपि पानी में पत्र गीले (जलाभिषेक) किये जाने पर अदृश्य अक्षर उभरकर स्पष्ट व सुवाच्य हो जाते हैं।


आहूति

इस महत् कृपा प्रसाद को जन जन में बांटने के लिये, सर्वप्रथम इसके वर्तमान संस्कृत लिपि में लिपिकरण तथा उन्हे श्लोकों में आबद्ध करने की आवश्यकता थी। जन जन तक ये आदर्श पहुंच सकें परमपूज्य श्री बेदिलजी ने ऋषि को प्रदत्त वचनों के अनुरूप कर्तव्य भाव से अपने तन, मन, धन और जीवन की आहूति देकर इस महायज्ञ को सफल किया।


सौभाग्य से

महालक्ष्मी की अनन्त कृपा, श्री अग्रसेन जी के दिव्य प्रकाश, महर्षि जैमिनी के आशिर्वाद, सद्गुरु श्री बृजमोहन जी गौतम के महत् मार्गदर्शन तथा अग्रवाल समाज के मनिषियों, विशिष्ट विद्वानों तथा विभूतियों के शुभ चिंतन के साथ ही, आदरणीय श्री बेदिलजी के सर्वस्व समर्पित सतत् २० वर्षों के तपपूर्ण, श्रमसाध्य भागीरथी प्रयत्नों से, जनकल्याण हेतु जगत के सौभाग्य से, यह सुधा सरिता गंगा की भांति - श्रीमद् अग्रभागवतम् -स्वरूप प्रवाहित हो रही है।


आनन्दमय जीवन का आधार

श्रीमद् अग्रभागवत श्री अग्रसेन की वाङ्गमय स्वरूप अजर, अमर और अविनाशी भगवत आत्मा है, जो उनके गुण,कर्म, प्रभाव व आदर्शों की साक्षी है।

श्री अग्रसेन की यह दिव्य जीवन गाथा अशांत जनमेजय को शांति व आनन्दमय जीवन का पथ प्रदर्शित करने के लिये व्यासजी के प्रधान शिष्य महर्षि जैमिनि द्वारा कही गई, जिसका अनुशीलन व अनुकरण करके सम्राट जनमेजय ने इस लोक में परम यश तथा वयोपरांत परम मोक्ष प्राप्त किया।

आज अशांत विश्व के लिये, श्री अग्रसेन की यह दिव्य जीवन गाथा निश्चित ही शांति व आनन्दमय जीवन का आधार बनेगी।

यह शुभकारी आख्यान जगत में सबके लिये कल्याणकारी हो ।